पलायन

घूमता-खोजता, चलता-फिरता, फिर निकल चला मैं। पहले शिक्षा, फिर नौकरी, फिर शिक्षा और दूसरी नौकरी। कभी क़स्बा, कभी शहर, कभी देश, कभी विदेश। हर जगह संभावनाएं खोजता, कभी दुसरो को, कभी खुद को ढ़ुंढ़ता। प्रवासी कहिये या अप्रवासी, जड़ो से उजड़ा हुआ कहिये या जड़हीन। घूमता-खोजता, चलता-फिरता, फिर निकल चलूँगा मैं।

क्या हिंदी जीवित रहेगी?

आखिरी सासें लेती, थकी-हारी, चरमराई, हिंदी की जो है हालत, उसे बचा सके दवा न दुहाई। अंग्रेजी का अत्यधिक उपयोग, नहीं है इसका कारण, ना ही इस बात पे रोने से, टलेगा इसका मरण। हिंदी के पुनर्जन्म का, बस एक ही है रास्ता, अपने स्तर पर उसका प्रचार, और भाषा के प्रति सच्ची आस्था। यूँ तो […]

मलहम-ए -खिचड़ी

आपको देख दिल पे चल जाती है अभी भी छुरिया, पर आपने तो फेका था हमें जैसे सीली हुई भुजिया। खा पी कर ले रही हो तुम डकार, पर क्या कभी याद किया तुमने पुराना प्यार? धराशायी मन, टूटे दिल की सिसकी, सोचा शांत करू इसे मार मदिरा की चुस्की। पर मदिरा की राह लेते है असफल […]

भुलक्कड़ भारत

मैं: विचलित मन, कुंठित जीवन, दिशाहीन, घटनाओं से सहमा, घबराया हुआ। हर क्षण है मरता मेरे अन्दर यह भारत, और भारतीयता की भावना। वो: विनष्ट तन, निर्जीव जीवन, मैं ही थी वो घटना जिसने तुम्हे था जगाया। मेरी मृत्यु के साथ मरी वो कल्पना, जिसे हमने भारत कहलाया। भारत: घटनाएं तो रोज़ होती है, मैं हो […]

किम्कर्त्व्यविमुढ

सब कुछ  था स्थिर, अविचलित, शांत सा, अचानक से इस दुविधा ने लाया एक बवंडर सा। क्या करे क्या ना करे के दोराहे पर मैं हु खड़ा, असमंजस से जूझता, पर इरादों पर अड़ा। इस पार है निराशा, उस पार आशा की किरण, बीच मझदार का सफ़र है, जिस पर तय होगा जीवन-मरण। -अभिषेक ‘देसी’ देशपांडे

अमृतसरी प्रेम कहानी, जो हो न सकी…

निकला था मैं देश देखने, खाने पीने, और कुछ अच्छा लिखने. क्या पता था यह सफ़र मेरा दिल तोड़ देगा, ग़म भरे मोड़ पर ला कर मुझे छोड़ देगा. भरवान दा ढाबा के वोह करारे कुलचे मदमस्त चने और खिलखिलाती लस्सी. फिरनी जैसी आपने कभी न खायी, नरम पनीर की बाहों में संतुष्टी पायी. चटोरेपन का […]

Episode I: What to eat in Varanasi?

Anything. Simply, anything. Amidst all the chaos and confusion of Varanasi, food is one thing which instills some sense of order, with its simple yet mouthwatering flavors dominating a lot of other experiences one has in the city. Varanasi’s food is defined by its place in Hindu culture and tradition, its regional influences (Eastern Uttar Pradesh and […]

थम सा गया ये देश.

दिशाहीन, उलझा सा, असमंजस से जूझता हुआ, मेरा देश ऐसा तो न था. घोटालो से चरमराया विश्वास, लोकतंत्र का बना मज़ाक. अर्थव्यवस्था की चरमरायी सी हालत, जाति-धर्म के अनसुलझे विवाद, क्या मेरा देश ऐसा ही था? पर इन सब के बीच कम से कम एक आशा थी, की कुछ बदलेगा, सामाजिक और आर्थिक विकास नहीं, […]

App आये बहार आयी.

रविवार का था वोह दिन, जब रह ना पा रहा था भोजन तकनीक के बिन. यह दिन का हसने का, मिलने जुलने का, संगणक और इन्टरनेट से बाहर निकल, हर व्यक्ति विशेष से मिलने का. Nokia का नाम देख याद आयी मुझे उस प्रसिद्द नागिन की चाल, सरलता और सुदृढ़ता के बल पर जिस Nokia […]

We are what we eat and whom we meet.

How about listening to locals talking about their life and aspirations while sipping a chai and dipping a Parle-G; or sharing a drink with an unknown traveler listening to their experiences; or cooking meals in someone’s kitchen creating chatpate menus; or weaving sari with a local weaver; or gobbling those lovely cutlets on Indian Railways […]