क्या हिंदी जीवित रहेगी?

आखिरी सासें लेती,
थकी-हारी, चरमराई,
हिंदी की जो है हालत,
उसे बचा सके दवा न दुहाई।

अंग्रेजी का अत्यधिक उपयोग,
नहीं है इसका कारण,
ना ही इस बात पे रोने से,
टलेगा इसका मरण।

हिंदी के पुनर्जन्म का,
बस एक ही है रास्ता,
अपने स्तर पर उसका प्रचार,
और भाषा के प्रति सच्ची आस्था।

यूँ तो भाषा कभी मरती नहीं,
वो होती है अमर,
पर ऐसे जीवन का भी क्या ही फायदा,
जब अपने ही घर बैसाखी पर निर्भर।

– अभिषेक ‘देसी देशपांडे

1 Comment

  1. राजेश says: Reply

    काफी अच्छी कविता लिखी है आपने और जहाँ तक हिंदी के जीवित रहने का सवाल है तो हमे निराश होने की जररूरत नहीं है यह केवेल जीवित ही नहीं बल्कि और फलेगी फूलेगी . आज हिंदी वर्ष 1950 से कहीं बेहतर हालत में है आज जादा लोग हिंदी बोल ही नहीं तहें बल्कि ये एक समपर्क भाषा के रूप में भी अपनी भूमिका बखूबी निभा रही है .

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