मलहम-ए -खिचड़ी

आपको देख दिल पे चल जाती है अभी भी छुरिया,
पर आपने तो फेका था हमें जैसे सीली हुई भुजिया।

खा पी कर ले रही हो तुम डकार,
पर क्या कभी याद किया तुमने पुराना प्यार?

धराशायी मन, टूटे दिल की सिसकी,
सोचा शांत करू इसे मार मदिरा की चुस्की।

पर मदिरा की राह लेते है असफल और बेकार,
हमने अपनाया खिचड़ी, पापड़, और अचार।
-अभिषेक देशपांडे ‘देसी’

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